राज्य ब्यूरो, देहरादून । उत्तराखंड के जंगलों में बाघ और गुलदार के हमलों का खतरा केवल वन्यजीवों की बढ़ती संख्या से नहीं, बल्कि मानव गतिविधियों और जंगल पर निर्भरता से भी जुड़ा है। इन वन्यजीवों के हमले एक समान पैटर्न पर नहीं होते, बल्कि दोनों के व्यवहार और पारिस्थितिकी में अंतर के कारण इनका स्वरूप पूरी तरह अलग है।
मानसून के दौरान गुलदार के हमले सबसे ज्यादा बढ़ते हैं, जबकि बाघों के हमले गर्मियों में अधिक होते हैं। ग्रामीणों का घास, लकड़ी लेने जंगल जाना अधिक जोखिमपूर्ण हो गया है। इस परिदृश्य में इन दोनों प्रजातियों का मनुष्य के साथ टकराव को थामने लिए नीतियां प्रजाति विशिष्ट होनी चाहिए।
पालमपुर (हिमाचल प्रदेश) के अमनदीप राठी के शोध अध्ययन में यह बातें सामने आई हैं, जो हाल में ही शोध जर्नल पीपुल एंड नेचर में प्रकाशित हुआ है। अमनदीप ने यह अध्ययन उत्तराखंड के सेवानिवृत्त मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक डा. राजीव भरतरी और भारतीय वन्यजीव संस्थान के पूर्व डीन डा. वाईवी. झाला के मार्गदर्शन में किया।
इसके तहत उन्होंने वर्ष 2000 से 2019 के बीच बाघों के 132 और गुलदार के 1,914 हमलों का विश्लेषण किया। अध्ययन के अनुसार समय के साथ दोनों प्रजातियों के हमलों में वृद्धि हुई है। अध्ययन के मुताबिक गुलदार अत्यधिक अनुकूलनशील और मायावी (छिपकर रहने वाले) होते हैं, जिससे उनके लिए मानव बहुल क्षेत्रों के आसपास रहना संभव हो जाता है।
राज्य में गुलदारों के औसतन 98 हमले प्रतिवर्ष दर्ज किए गए। इनमें 22.3 प्रतिशत जानलेवा रहे। मानसून के दौरान खेतों में फसल का घना आवरण होने पर गुलदार के हमले बढ़ जाते हैं। बाघों के औसतन सात हमले प्रतिवर्ष दर्ज हुए, लेकिन इनमें 34.8 प्रतिशत घातक रहे। अध्ययन में बात सामने आई कि गर्मियों में बाघों के हमले बढ़े।
इस दौरान ग्रामीण वन उपज जुटाने और वानिकी कार्यों के लिए अधिक संख्या में जंगल जाते हैं। बाघों के हमले मुख्य रूप से जंगलों के भीतर, संरक्षित क्षेत्रों के आसपास और कम आबादी वाले इलाकों में हुए। बाघों के हमलों की बढ़ती आवृत्ति का संबंध इनकी बढ़ती आबादी से भी पाया गया।
वयस्क पुरुष ज्यादा शिकार, बच्चों-महिलाओं के लिए खतरा अधिक
दोनों वन्यजीवों के हमलों में वयस्क पुरुष सबसे अधिक प्रभावित हुए, लेकिन बच्चों और महिलाओं में हमले के घातक होने की दर अधिक रही। ऐसे में कमजोर आयु समूहों की सुरक्षा को अलग रणनीति बनाने की जरूरत है। अध्ययन में जंगल पर निर्भरता घटाने पर जोर दिया गया है।
सुरक्षित घर, शौचालय, पेयजल, 24 घंटे बिजली और सोलर या इलेक्ट्रिक कुकिंग की सुविधा, वैकल्पिक आजीविका, मवेशियों के लिए सुरक्षित बाड़े संबंधी सिफारिशें भी की गई है। कहा गया है कि जंगल से सटे खेतों में दिन में समूह बनाकर काम करने, बच्चों और बुजुर्गों की विशेष निगरानी तथा संवेदनशील क्षेत्रों में जरूरत के अनुसार फेंसिंग अपनाने से भी खतरा कम किया जा सकता है।