12 की उम्र में छोड़ा स्कूल, 15 में मां के कंगन बेच शुरू किया बिजनेस; फिर बंद होने जा रही कंपनी को खरीद बना ₹11000 करोड़ का मालिक

नई दिल्ली। भारत में कई बड़े ज्वैलर्स हैं। इनमें टाइटन, मालाबार गोल्ड, कल्याण ज्वैलर्स और पीसी ज्वैलर्स शामिल हैं। इन कंपनियों के सफल होने की अपनी कहानी है, मगर हम आपको यहां आज एक ऐसी ज्वैलरी कंपनी की जानकारी देंगे, जो डूब रही थी। मगर एक शख्स ने उसे खरीदा और हजारों करोड़ रुपये की कंपनी में बदल दिया। आइए जानते हैं इस कंपनी और इसके मालिक के बारे में।

कम उम्र में छोड़ा स्कूल

ये कहानी है किरण कुमार की, जो 'ललिता ज्वैलरी' (Lalithaa Jewellery) के मालिक हैं। उनका सफर आर्थिक संघर्ष से शुरू हुआ। वे नेल्लोर (आंध्र प्रदेश) में एक आर्थिक रूप से कमजोर परिवार में जन्मे। वे अपने माता-पिता की आठवीं संतान हैं। परिवार की जिम्मेदारी के चलते किरण ने कम उम्र में ही स्कूल छोड़ा और ज्वैलरी के कारोबार में आ गए।

परिवार की गरीबी का था ये आलम

किरण के पिता ज्वैलर्स के यहाँ अकाउंटेंट का काम करते थे, लेकिन परिवार का खर्च चलाना मुश्किल था। किरण ने खुद एक बार अपने बचपन की मुश्किलों के बारे में बताया कि उन्होंने गरीबी को बहुत करीब से देखा और कभी-कभी शादी में जाने के लिए उन्हें किसी दोस्त की टी-शर्ट उधार लेनी पड़ती थी।

मां के कंगनों से कारोबार किया शुरू

जब किरण ने अपना बिजनेस शुरू करने का फैसला किया, तो उनके पास एकमात्र पूंजी वह सोना था जो उनकी माँ उन्हें दे सकती थीं। ये सोना था महज 4 सोने की चूड़ियां। 12 साल की उम्र में स्कूल छोड़ने के बाद वे ज्वैलरी ट्रेड में नौकरी करने लगे।

इसी दौरान उन्हें एक मौका दिखाई दिया। नेल्लोर में बनी ज्वैलरी चेन्नई और हैदराबाद जैसे बड़े बाजारों में सप्लाई हुआ करती थी। उन्होंने सोचा कि वह भी प्रोडक्ट्स को सीधे चेन्नई ले जाएंगे।

सोने की चूड़ियां बेच दीं

15 साल की उम्र में, किरण ने चेन्नई में एक छोटा सा ट्रेडिंग बिजनेस शुरू करने के लिए अपनी माँ की सोने की चार चूड़ियाँ बेच दीं। फिर किरण एक सुनार के पास गए और उससे छह जोड़ी झुमके बनवाए। इसके बाद, खरीदार खोजने के लिए वे चेन्नई गए।

उन्हें पहला बड़ा मौका टी. नगर में ललिता ज्वैलरी में मिला, जिसे उन्होंने बाद में खरीद लिया। एक बार वे देर रात ललिता ज्वैलर्स के स्टोर पर पहुँचे, जब वे दुकान बंद होने वाली थी। वह उसके मालिक एम. एस. कंडास्वामी पिल्लई से मिले और उन्हें नेल्लोर से लाई गई ज्वैलरी दिखाई।

ज्वैलरी की क्वालिटी जाँचने के बाद, पिल्लई ने 100 ग्राम का शुरुआती ऑर्डर दिया। जैसे-जैसे माँग बढ़ी, ऑर्डर 200 ग्राम कर दिया गया। कुमार ने ललिता और आंध्र प्रदेश के दूसरे होलसेलर्स को ज्वैलरी सप्लाई करना शुरू कर दिया।

ऑर्डर पर ऑर्डर बढ़ते गए

ऑर्डर बढ़ने के साथ, किरण अक्सर सरकारी बसों से नेल्लोर और चेन्नई के बीच यात्रा करते थे। समय के साथ, उनका होलसेल का कारोबार काफी बढ़ गया। आखिरकार, उन्होंने बड़े शोरूम और कनाडा, लंदन, सिंगापुर और दुबई जैसे इंटरनेशनल मार्केट में भी ज्वैलरी सप्लाई करनी शुरू कर दी।

सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट 24 फरवरी 1999 को आया। कंडास्वामी पिल्लई भारी आर्थिक मुश्किलों का सामना कर रहे थे और कर्ज से जूझ रहे थे। किरण के साथ उनके कारोबारी रिश्तों की वजह से अच्छे संबंध बन गए थे। तब किरण ने उनकी मदद के लिए हाथ बढ़ाया।

बड़ी ज्वैलरी चेन बन गई कंपनी

1999 में, किरण ने मुश्किलों से जूझ रहे ललिता ज्वैलरी के बिजनेस का कंट्रोल ले लिया और उसका कर्ज चुकाया। यानी वे इसके फाउंडर नहीं हैं, मगर आज इस ज्वैलरी कंपनी के मालिक और मैनेजिंग डायरेक्टर हैं।

कंपनी को खरीदकर किरण होलसेल से रिटेल में आए, कस्टमर वैल्यू पर आधारित कम कीमत वाली स्ट्रैटेजी अपनाई और कंपनी को एक बड़ी ज्वैलरी चेन के तौर पर फैलाया। आज ललिता ज्वैलरी मार्ट की वैल्यूएशन लगभग ₹11,250 करोड़ है।

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