Iran America War: 'जंग से निकलने के लिए हमें...', ट्रंप संग डील को मजबूर पेजेशकियान ऐसा क्यों बोले ?

पिछले करीब छे महीनों से अमेरिका और ईरान में चल रही जंग के बीच इरानी राष्ट्रपति मसूद बेजीशकियाँ ने कुछ ऐसा बयान दे दिया जिससे ऐसा लग रहा है जैसे मानो अब। ईरान और युद्ध के मूड में नहीं है। अब वो भी यही चाहते हैं कि जीतने जल्दी हो सके। ये युद्ध खत्म हो। इस बीच ईरान के राष्ट्रपति ने भी अमेरिका के साथ हुए समझौते के ज्ञापन का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि इस युद्ध से बाहर निकलना जरूरी है। और समझौता ही इसका एकमात्र विकल्प है। सरकारी समाचार एजेंसी आई आरएन एस से बातचीत में उन्होंने कहा, इसमें एक भी ऐसा प्रावधान नहीं है जो आत्मसमर्पण के बराबर हो। ये बयान ईरान के कट्टरवादी समूह के उस बयान पर था। जिसमें ये आरोप लगाए गए थे कि इरानी सरकार ने अमेरिका के सामने सरेंडर कर दिया। हालांकि ने साफ कर दिया कि ईरान में सुप्रीम लीडर ही नीतियां तय करते हैं और हम उसी रास्ते पर चलते हैं। ने साफ किया कि अमेरिका के साथ हुआ समझौता कोई जल्दबाजी में लिया गया फैसला नहीं है, बल्कि इसके पीछे लंबी बातचीत और ईरान के अंदर बनी सहमति थी। ने यहाँ तक कहा कि मौजूदा संकट से बाहर निकलने के लिए यही समझौता सबसे बेहतर। रास्ता है। इस समझौते का समर्थन करने के पीछे की वजह भी इरानी राष्ट्रपति ने खुलकर साझा की। उन्होंने बताया कि अगर ईरान में इस तरह के हमले होते रहे या फिर ईरान, अमेरिका में ये जंग चलती रही तो इससे ईरान के भविष्य पर बड़ा संकट मंडरा सकता है। क्योंकि युद्ध के इस गतिरोध में ईरान विदेशी निवेश आकर्षित करने में नाकाम हो रहा है और बिना विदेशी करेन्सी के दुनिया में व्यापार करना असंभव है। ऐसे में ईरान के सामने भविष्य के लिए बड़ी मुसीबत खड़ी हो सकती है। इसके साथ ही अमेरिका और इजराइल के साथ जारी इस युद्ध में कड़े प्रतिबंधों। और नौसैनिक नाकेबंदी के कारण ईरान की अर्थव्यवस्था को बड़ा नुकसान पहुंचा है। और अगर ऐसे ही चलता रहा तो भविष्य में बड़ी बाधाएं आ सकती है। इरानी राष्ट्रपति पेजिस ने खास तौर पर इस बात पर भी ज़ोर दिया क्नॉइस की समझौते के समय सैन्य और नागरिक दोनों पक्षों से राय ली गई थी। उनका कहना है कि लंबी बातचीत के बाद ही एक्स्पर्ट के बीच सहमति बनी और उसी आधार पर समझौते की दिशा में कदम बढ़ाया। क्या यानी का संदेश साफ है? अमेरिका से बातचीत करना ईरान की कमजोरी नहीं बल्कि राष्ट्रीय हित में लिया गया फैसला था। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। अमेरिका और ईरान के बीच बना 60 दिन का अंतरिम समझौता आगे किसी व्यापक डील का रास्ता खोलने वाला था। इसमें युद्ध खत्म करने और परमाणु युद्ध पर आगे बातचीत की उम्मीद थी, लेकिन समय सीमा खत्म होने के बाद दोनों देशों के बीच मतभेद फिर गहरा गए। अमेरिका ने समझौते को आगे बढ़ाने पर आपत्ति जताई जबकि ईरान ने अमेरिकी कदमों और प्रतिबंधों को समझौते की भावना की खिलाफ़ बताई। बड़ी बात ये है कि इसके बावजूद ब्रिस्कियन ने बातचीत का दरवाजा पूरी तरह से बंद नहीं किया। उनका ताजा रुख यही संकेत देता है कि ईरान मौजूदा संकट का कूटनीतिक समाधान चाहता है, लेकिन तेहरान की शर्त भी साफ है कि ईरान अमेरिकी दबाव प्रतिबंध। और सैन्य धमकियों के सामने अपनी सुरक्षा और संप्रभुता से समझौता नहीं करना चाहता। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराकची ने भी कहा है कि सम्मानजनक बातचीत होनी चाहिए और केवल प्रतिबंध या सैन्य कार्रवाई से समस्या का समाधान नहीं होगा। का बयान ऐसे समय पर आया है जब ईरान पर आर्थिक और दबाव काफी ज्यादा बड़ा हुआ है। अमेरिका नई और कड़े प्रतिबंधों की तैयारी में है। दूसरी तरफ ईरान का कहना है कि वो ऐसे किसी भी दबाव के सामने झुकने वाला नहीं है। लेकिन आखिरकार ईरान के राष्ट्रपति मसूद ने साफ कर दिया है की भाई अगर इस जंग से दोनों देशों को बाहर निकलना है तो इसका सिर्फ एकमात्र विकल्प है और वो है बातचीत। बिना बातचीत के दोनों ही देश इस जंग से बाहर नहीं निकल सकते। इसलिए हर हाल में बातचीत के टेबल पर आना जरूरी है। फिलहाल इस वीडियो में इतना ही इजाजत दीजिए। नमस्कार।