रजिया नूर, श्रीनगर। श्री अमरनाथ जी की वार्षिक यात्रा को यूं ही आस्था और हौसले की यात्रा नहीं कहा जाता। हिमालय की गोद में बिराजमान बाबा बर्फानी के दर्शनों के लिए जब श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ता है, तो उसमें ऐसे भक्त भी शामिल होते हैं, जिन्हें देखकर हर किसी की आंखें नम हो जाती हैं।
किसी के हाथ नहीं, तो किसी के पैरों में दिक्कत है, कोई नेत्रहीन है तो कोई सुनने की क्षमता से महरूम है। लेकिन शरीर की तमाम बंदिशों के बावजूद इनके हौसले हिमालय से भी ऊंचे हैं। दुर्गम, पथरीले और तीखी ढलानों वाले रास्तों पर ये भक्त बम-बम भोले और हर-हर महादेव के जयकारे लगाते हुए पवित्र गुफा की ओर बढ़ रहे हैं।
बिना पैरों के 21वीं बार बाबा के दर पर पहुंचे बाबू राम
ऐसे ही एक हौसले की मिसाल हैं बिहार के बेगूसराय के बलिया क्षेत्र के निवासी 57 वर्षीय बाबू राम। बाबू राम के दोनों पैर नहीं हैं। लेकिन बिना पैरों के भी वह एक लाठी के सहारे हिमालय की इन दुर्गम चोटियों को नाप चुके हैं।
यह कोई पहली बार नहीं है। बाबू राम अब तक 20 बार बाबा बर्फानी के चरणों तक पहुंच चुके हैं और आज 21वीं बार वह बालटाल के रास्ते से बाबा के दर्शन कर वापस लौटे हैं। हाथ में पकड़ी एक लाठी के सहारे बालटाल की तीखी ढलानों पर धीरे-धीरे रेंगते हुए जब उनसे पूछा गया कि क्या इन कठिन रास्तों पर चलने में दिक्कत नहीं होती?
तो चेहरे पर मुस्कान लिए उन्होंने कहा, 'नहीं, मुझे महसूस नहीं होता। बल्कि मुझे आस्था से भरी यह यात्रा करके आनंद मिलता है।' रास्ते में घोड़ों और खच्चरों पर सवार श्रद्धालुओं को हाथ हिला-हिलाकर आगे बढ़ने का इशारा करते हुए बाबू राम कहते हैं, 'बाबा की भक्ति में डूबे भक्तों को इस सफर की कठिनाइयां महसूस नहीं होती। वह तो बाबा बर्फानी की धुन में खोए रहते हैं।'
बाबू राम बताते हैं, 'आज से 20 साल पहले जब मैंने घरवालों से इस यात्रा पर आने की इच्छा जताई तो उन्होंने कहा, बहुत कठिन यात्रा है, कैसे कर पाओगे। तब मैंने जवाब दिया था, मैं अवश्य जाऊंगा, भोलेनाथ मेरी सहायता करेंगे और वाकई भोलेनाथ ने मुझ पर कृपा की।'
वह आगे कहते हैं, 'आज से 20 वर्ष पहले यहां इतनी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हुआ करती थीं। लेकिन मैंने तब भी अपना पराक्रम जारी रखा और आज इतनी सुविधाओं के बीच भी मैं अपनी यह यात्रा जारी रखे हुए हूं और अगले वर्ष भी मैं भोले के दर्शनों को आऊंगा।'
प्लास्टिक की टांगों पर 5 हजार फीट की चढ़ाई
दूसरी प्रेरणादायक कहानी है राजस्थान के उदयपुर के गौरव भार्गव की। गौरव की दोनों टांगे नहीं हैं। वह घुटनों तक आर्टिफिशियल लिम्ब पहनकर इस पवित्र यात्रा में शामिल हुए हैं। गौरव ने बताया, 'पांच वर्ष पहले मैंने एक दुर्घटना में अपनी दोनों टांगे खो दी थीं। काफी समय तक मैं मानसिक तनाव से जूझता रहा। लेकिन फिर ऊपर वाले की इच्छा समझ अपनी इस विकलांगता को स्वीकार कर लिया।'
गौरव ने कहा, '2024 में मैं पहली बार बाबा बर्फानी के दर्शनों को आया था। आज फिर आया हूं।' जब उनसे पूछा गया कि प्लास्टिक की टांगों के साथ यह कठिन यात्रा करने में दिक्कतें आई होंगी, तो उन्होंने कहा, 'नहीं, यह आस्था का सफर है। मैं इसी आस्था के सहारे तय कर रहा हूं।'
बाबू राम और गौरव जैसे न जाने कितने शारीरिक रूप से विकलांग श्रद्धालु इस यात्रा में शामिल हैं, जो आस्था और हौसलों के साथ यह पवित्र तीर्थयात्रा कर रहे हैं और दुनिया को यह संदेश दे रहे हैं कि अगर मन में सच्ची श्रद्धा हो तो कोई भी मंजिल असंभव नहीं।
आपको बता दें कि 3 जुलाई से शुरू हुई इस पवित्र यात्रा में अभी तक दोनों यात्रा मार्गों- पहलगाम और बालटाल से ढाई लाख से अधिक श्रद्धालु बाबा बर्फानी के दर्शन कर चुके हैं। 57 दिनों की यह पवित्र यात्रा 28 अगस्त को संपन्न हो रही है।