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Invention of LPG Gas Cylinders: इंसानों और जरूरतों का चोली-दामन का साथ है. वहीं आवश्यकता अविष्कारों की जननी है. हर दौर में ये बातें सच साबित हुई हैं. ईरान की जंग ने बड़े-बड़े तेल-गैस, खासकर एलपीजी सप्लायर्स के होश उड़ा रखे हैं. भारत में भी एलपीजी गैस का सिलेंडर लेने के लिए मार्च के महीने में शहर दर शहर लंबी कतारें देखी गईं. महज एक सिलेंडर के लिए लोगों का परेशान चेहरा देख, बहुत से लोगों के मन में एलपीजी सिलेंडर के अविष्कार की कहानी के बारे में जानने की जिज्ञासा जागी होगी. क्या आपको मालूम है, खाना बनाने के लिए एलपीजी सिलेंडर बनाने का आइडिया सबसे पहले कहां और किसे कहां आया था. अगर नहीं तो हम आपको बताते हैं कि रसोई गैस वाले सिलेंडर की ईजाद कैसे हुई.
भारत में कभी घर-घर में मिट्टी के बने चूल्हों पर पेड़ की सूखी लकड़ियों का इस्तेमाल करके खाना बनाया जाता था. जमाना बदला तो खाना बनाने के तौर-तरीके भी बदले. आगे चलकर अंगीठी फिर स्टोव में केरोसीन ऑयल की मदद से भोजन बनने लगा. उसके बाद एलपीजी सिलेंडर और अब बड़े शहरों में सीधे आपके किचन तक पीएनजी गैसलाइन की पाइप पहुंच चुकी है.
एलपीजी सिलेंडर के ईजाद की कहानी
बात एक सदी से ज्यादा पुरानी है. भारत अंग्रेजों का गुलाम था. रेलगाड़ी चल चुकी थी. अंग्रेज बहादुर कारों से चलते थे. ब्रिटेन समेत यूरोप के तमाम शहरों में कारखाने लगने लग चुके थे. सारी सुविधाओं के बावजूद लोगों के घर में खाना स्टोव में मौजूद तेल यानी लिक्विड फ्यूल से बनता था, क्योंकि उस समय एलपीजी सिलेंडर का आविष्कार नहीं हुआ था.
बात अमेरिका की है. जहां एक शख्स अपनी कार लेकर गैराज पहुंचा. उसकी समस्या सुनकर मेकैनिकों के होश उड़ गए. उसने टैंक फुल कराया था. टैंक में लीकेज नहीं था. फिर भी पेट्रोल की सुई का कांटा गिरता जा रहा था. जब ये शिकायत वाल्टर ओ स्नेलिंग की डेस्क पर पहुंची तो उसका माथा ठनका. वाल्टर होशियार था. केमिस्ट्री उसका पसंदीदा विषय था. तब उसने जिस दिशा में सोचा, उसके बारे में ज्यादा रिसर्च नहीं हुई थी. वाल्टर ने दिमाग के घोड़े दौड़ाते हुए पाया कि पेट्रोल भाप बनकर उड़ रहा था.
वाल्टर की सोच ने उन्हें पेट्रोलियम पदार्थों के भीतर छिपी वोलाटाइल गैसों के अजीब व्यवहार का पता लगाने में मदद की. उस समय ईंधन को महज लिक्विड स्टेज वाला प्रोडक्ट समझा जाता था. उनके इस विचार पर कुछ खास प्रयोग भी नहीं हुए थे, कि पेट्रोलियम उत्पादों खासकर तेल के अंदर की हल्की गैसें आसानी से भाप बनकर टैंक खाली कर सकती हैं.
आईडिया
अपनी छोटी लैब में, वाल्टर ने पेट्रोलियम पदार्थों के हिस्सों को अलग करना शुरू किया. उसने देखा कि वे तत्व कैसे काम करते हैं. उसके कुछ हिस्से तेजी से भाप बन गए. दूसरे लोग इस दिशा में सोच-विचार कर पीछे रह गए. वहीं वाल्टर ने धीरे-धीरे, गैसों के उस ग्रुप की पहचान की जो भाप बनकर गायब हो रहे पेट्रोल की जिम्मेदार थीं.
पहचान
इन गैसों में प्रोपेन और ब्यूटेन शामिल थीं. वे हल्की, बहुत ज्यादा जलने वाली और हवा में तेजी से फैलने वाली गैसें थीं. रिफाइनरियों ने उनके रिसर्च को तेल प्रोसेसिंग के बचे अवशेषों को महज मुश्किलें बढ़ाने वाली चीज माना. वाल्टर से उस दौर की बर्बादी नहीं देखी गई. उन्होंने उन बची चीजों में नई संभावना देखी. उन्होंने इन गैसों (मुख्य रूप से प्रोपेन और ब्यूटेन) को अलग किया और उन्हें हाई प्रेशर पर लिक्विड (तरल) में बदलकर सिलेंडरों में सुरक्षित रूप से स्टोर करने की तकनीक विकसित की. कुछ और प्रयोगों के बाद ये गैसें सुरक्षित तरीके से जलने लगीं. इसे ही लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस या LPG के नाम से जाना गया.
किसी गाड़ी का फ्यूल उड़ रहा था. उस परेशानी ने वाल्टर को एलपीजी सिलेंडर बनाने का बेसिक आइडिया दिया. जिसने एक नई तरह के फ्यूल का रास्ता खोला. वाल्टर ने न सिर्फ जल्दी उड़ने वाली गैसों की पहचान की, बल्कि उन्हें अलग-अलग करके, उच्च दाब वाले सिलेंडरों में सुरक्षित रूप से स्टोर करने का तरीका खोजा. ये करना बहुत जरूरी था. क्योंकि मजबूत और सुरक्षित कंटेनर के बिना, गैस बस बाहर निकल जाती थी.
रिपोर्ट्स के मुताबिक इंजीनियरों और कंपनियों ने जल्द ही इस संभावना को पहचाना. उसी दौर में एलपीजी को बड़े पैमाने पर इस्तेमाल में लाने में मदद करने वाले गिने चुने कारोबारी घरानों में फिलिप्स पेट्रोलियम नाम की कंपनी भी थी. जिसने फ्यूल के प्रोडक्शन और मार्केटिंग में अहम भूमिका निभाई. आगे चलकर यही सिलेंडर हमारे आपके किचन में पहुंचे.
कौन थे वाल्टर?
वाल्टर का जन्म 1880 में वाशिंगटन डी.सी. में हुआ था. वो बहुत क्रिएटिव थे. उस दौर में केमिस्ट्री और इंजीनियरिंग की बदौलत अमेरिकी इंडस्ट्री में नए-नए बदलाव आ रहे थे. वाल्टर के एक प्रयोग की बदौलत, खाना बनाने का नया ईंधन दुनिया को मिल सका.